Religious and social reforms after 1858

In past, there are lots of organizations are made to reform humans on religious and social platforms, but here we are going to tell the main Religious and social reforms after 1858.

1858 के बाद धार्मिक और सामाजिक सुधार-

1) ब्रह्मा समाज-

1828 में ब्रह्म समाज को राजा राममोहन राय ने स्थापित किया था।

1814 में, राजा राम मोहन राय ने “आत्मीय सभा” का गठन किया।

आत्मीय सभा ने समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधारों को आरंभ करने का प्रयास किया।

राजा राम मोहन राय ने महिलाओं के अधिकारों के लिए अभियान चलाया, जिसमें विधवाओं के पुनर्विवाह का अधिकार और महिलाओं के लिए संपत्ति रखने का अधिकार शामिल था।

उन्होंने सती व्यवस्था और बहुविवाह की प्रथा का सक्रिय विरोध किया।

1829 में विलियम बेंटिक ने कानून बनाकर “सती प्रथा” को अवैध घोषित किया ।

नवंबर 1830 में राममोहन रॉय इंग्लैंड के लिए रवाना हुए।

अकबर द्वितीय ने राममोहन रॉय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी।

राजा राम मोहन राय का निधन 27 सितंबर, 1833 को मेनिन्जाइटिस के कारण ब्रिस्टल के पास स्टेपलटन(Stapleton) में हुआ था।

1843 के बाद देवेंद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज की परंपरा को आगे बढ़ाया ।

1866 के बाद केशवचंद्र सेन ने ब्रह्म समाज के आंदोलन को आगे बढ़ाया

ब्रह्म समाज के सिद्धान्त

1) ईश्वर एक है और वह संसार का निर्माणकर्ता है।

2)आत्मा अमर है।

3)मनुष्य को अहिंसा अपनाना चाहिए।

4) सभी मानव समान है।

उद्देश्य-

1) हिन्दू धर्म की कुरूतियों को दूर करते हुए, बौद्धिक एवम् तार्किक जीवन पर बल देना।

2) एकेश्वरवाद पर बल।

3)समाजिक कुरूतियों को समाप्त करना।

कार्य-

1)उपनिषद और वेदों की महता को सबके सामने लाया।

2) समाज में व्याप्त सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह के विरोध में जोरदार संघर्ष।

3) पाश्चत्य दर्शन के बेहतरीन तत्वों को अपनाने की कोशिश करना।

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रामकृष्ण मिशन(1 मई 1897)–  

इस मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1 मई, 1897 ई. में की थी।

रामकृष्ण मिशन एक हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक संगठन है, जो रामकृष्ण आंदोलन या वेदांत आंदोलन के रूप में जाना जाने वाला एक विश्वव्यापी आध्यात्मिक आंदोलन का मूल है।

इस मिशन का नाम भारतीय संत रामकृष्ण परमहंस द्वारा रखा गया है , और इसकी स्थापना 1 मई 1897 को रामकृष्ण के प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद ने की थी।

संगठनों का मुख्यालय बेलूर मठ में है।

विवेकानंद एक भिक्षु बन गए और 1893 विश्व धर्म संसद में एक प्रतिनिधि थे।

वहां उनका भाषण, “अमेरिका की बहनों और भाइयों” के साथ प्रसिद्ध हुआ और उन्हें व्यापक मान्यता मिली।

विवेकानंद व्याख्यान यात्राओं पर गए और हिंदू धर्म और आध्यात्मिकता पर निजी प्रवचनों का आयोजन किया।

उन्होंने 1894 में संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यूयॉर्क में पहली वेदांत सोसायटी की स्थापना की।

आदर्श वाक्य और सिद्धांत-

मिशन के उद्देश्य और आदर्श विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक और मानवीय हैं और इसका राजनीति से कोई संबंध नहीं है।

विवेकानंद ने “त्याग और सेवा” को आधुनिक भारत के दोयम राष्ट्रीय आदर्शों के रूप में घोषित किया और मिशन का काम इनका अभ्यास करने और प्रचार करने का प्रयास करता है।

भगवद्गीता में उपनिषदों और योग के सिद्धांतों को रामकृष्ण के जीवन और शिक्षाओं के प्रकाश में पुनर्व्याख्यायित किया गया जो मिशन के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत है।

आर्य समाज(1875)-

आर्य समाज की स्थापना वर्ष 7 अप्रैल 1875 में बंबई में स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) द्वारा की गई थी।

मानवीय मूल्यों और प्रथाओं को बढ़ावा देने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए एक सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में आर्य समाज का गठन किया गया था।

यह सभी प्रकार के ज्ञान और ज्ञान के एक फव्वारे के रूप में वेदों के अचूक अधिकार पर बल देता है।

इस  समाज के इतिहास का एक अध्ययन आपको समाज के उत्थान के लिए आर्य समाज आंदोलन द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों से अवगत कराएगा।

आर्य समाज वेद के अचूक अधिकार में विश्वास के आधार पर मूल्यों और प्रथाओं को बढ़ावा देता है।

यह हिंदू धर्म में अभियोजन शुरू करने वाला पहला हिंदू संगठन था।

पहला वैदिक स्कूल 1869 में फर्रुखाबाद में स्थापित किया गया था

मिर्जापुर (1870), कासगंज (1870), छलेसर (अलीगढ़) (1870) और वाराणसी (1873) वैदिक स्कूल स्थापित किये ।

मुख्य कृतियाँ-

1)सत्यार्थप्रकाश            3) पंचमहायज्ञविधि           5) व्यवहारभानु

2)गुरु पूर्णिमा                4) गोकरुणानिधि             6) आर्याभिविनय

आर्य समाज के 10 प्रमुख सिद्धांत

  1. वेद ही ज्ञान के स्रोत हैं अतः वेदों का अध्ययन आवश्यक है
  2. वेदों के आधार पर मंत्र पाठ करना
  3. मूर्ति पूजा का खंडन
  4. तीर्थ यात्रा और अवतारवाद का विरोध
  5. कर्म पुनर्जन्म एवं आत्मा के बारम्बार जन्म लेने पर विश्वास
  6. एक ईश्वर में विश्वास जो निरंकारी है
  7. स्त्रियों की शिक्षा को प्रोत्साहन
  8. बाल विवाह और बहुविवाह का विरोध
  9. कुछ विशेष परिस्थितियों में विधवा विवाह का समर्थन
  10. हिंदी एवं संस्कृत भाषा के प्रसार को प्रोत्साहन

थियिसोफिकल सोसाइटी(1875)-

इसकी  स्थापना 1875 में रूसनिवासी ‘मैडम एच.पी.ब्लैवेत्स्की’ और अमेरिका निवासी ‘कर्नल एच.एस.आल्काट’ ने अन्य सहयोगियों के साथ अमेरिका में की थी।

बाद में वे भारत आए और 1886 में अदियार में मद्रास के पास अदिया मुख्यालय स्थापित किया।  बर्टरम कैटले इसके पहले प्रधानमंत्री थे।

1895 में राष्ट्रीय शाखा का प्रधान कार्यालय वाराणसी लाया गया।

1893 में एनी बेसेंट भारत आई । उनके नेतृत्व में थियोसोफिकल आंदोलन भारत में बहुत तेजी से फैला।

वह 1907-33 से थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्ष थीं।

सन् 1896 में उद्देश्यों को निम्नलिखित वर्तमान रूप में निर्धारित किया  गया-

1) मानव जाति के सार्वभौमिकम मातृभाव का एक केंद्र बिना जाति, धर्म, स्त्री पुरुष, वर्ण या रंग के भेदभाव को स्वीकार करता है, बनाना।

2) विविध धर्म, दर्शन और विज्ञान के अध्ययन को प्रोत्साहित करना।

3) प्रकृति के अज्ञात नियमों और मानव में अंतर्हिंथ शक्ति का शोध करना।

अलीगढ़ आंदोलन(1875)

अलीगढ़ आंदोलन सर सैयद अहमद खाँ के बीज्रव में बन गया था, एक प्रमुख इस्लामी आंदोलन है, जो 1857 के विद्रोह के असफलता के बाद मुसलमानों में धार्मिक सुधारों के उद्देश्य से माना गया है।

सर सैय्यद अहमद खान मुस्लिमों की दयनीय स्थिति को लेकर बहुत चिंतित थे और उन्हें उनके पिछड़ेपन से ऊपर उठाकर उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।

उन्होंने ब्रिटिश शासकों के मन में मुस्लिमों के प्रति शत्रुता के भाव को समाप्त करने के लिए अथक प्रयास किया |

उन्होंने मुस्लिमों से सादगी व शुद्धता के मूल इस्लामिक सिधान्तों की ओर लौटने की अपील की और भारत के मुस्लिमों के लिए अंग्रेजी शिक्षा की वकालत की |

1863 ई. में सर सैयद अहमद ने मोहम्मडन लिटरेरी सोसायटी की स्थापना की।

उनके द्वारा विज्ञान पर अत्यधिक बल देने के कारण रूढ़िवादी मुस्लिम रिश्तों से नाराज हो गए और उन्हें इनका विरोध भी झेलना पड़ा |

1875 में, सर सैयद ने अलीगढ़ में मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की

1920 तक यह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विख्यात हुई।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आंदोलन का प्रारंभिक बिंदु है।

सर सैय्यद अहमद खान भारत के महान मुस्लिम सुधारकों में से एक थे | उन्होंने आधुनिक तर्कवाद और विज्ञान के प्रकाश में कुरान की व्याख्या की |

उन्होंने धर्मान्धता, व्यवहार्यता और कट्टरपन का विरोध किया और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देने पर बल दिया |

सैयद अहमद ने तहजीब-उल-अखलाक पत्रिका का संपादन भी किया|

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यंग बंगाल आंदोलन

इस आंदोलन का श्रेय हेनरी विवियन डेरोजियो को जाता है।

उन्होंने “एकेडमिक एसोसिएशन” एवं “सोसाइटी फॉर द एग्जीबिशन ऑफ जनरल नॉलेज” की स्थापना की।

उन्होंने ईस्ट इंडिया दैनिक पत्रिका भी संपादन किया।

डेरोजियो को आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रकवि माना जाता है।

प्रार्थना समाज

1867 ई. में प्रार्थना समाज की स्थापना आत्माराम पांडुरंग ने की थी।

इसकी स्थापना के प्रेरणास्रोत केशव चंद्र सेन थे।

इसका उद्देश्य

  • जाति प्रथा का विरोध
  • स्त्री-पुरुष विवाह की आयु में वृद्धि
  • विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन

थोड़े समय बाद महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर भी इसमें शामिल हुए।

वहाबी आंदोलन

इस आंदोलन के प्रमुख संत अब्दुल वहाब थे।

आंदोलन को सबसे ज्यादा प्रचारित करने का सर सैयद अहमद बरेलवी एवं मिर्जा अजीज को दिया जाता है।

उद्देश्य

  • दर-उल-हर्ब को दर-उल-इस्लाम में बदलना

आंदोलन का मुख्य केंद्र पटना में था।

देवबन्द आंदोलन

1866-67 में मोहम्मद कासिम नैनोतवी एवं रशीद अहमद गंगोही द्वारा यह आंदोलन सहारनपुर में चलाया गया।

अब्दुल कलाम आजाद भी इस आंदोलन से जुड़े हुए थे।

उद्देश्य

  • मुस्लिम संप्रदाय के लिए धार्मिक नेता तैयार करना।
  • विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अंग्रेजी शिक्षा एवं पश्चिमी संस्कृति को प्रतिबंधित करना।

रहनुमाई माजदायासन सभा

1851 ई. में दादा भाई नौरोजी, नौरोजी फरदुनजी एवं एस.एस.बंगाली ने मिलकर इसकी स्थापना की।

इस सभा के पहले अध्यक्ष: नौरोजी फरदुनजी

पहले सचिव: एस.एस.बंगाली

उद्देश्य

पारसियों की सामाजिक अवस्था का पुनरुद्धार करना था।

Religious and social reforms after 1858

सेवा सदन

1885 में बहरामजी एम. मालाबारी जो कि एक पारसी धर्म सुधारक थे, उन्होंने इसकी स्थापना की।

उद्देश्य

  • शोषित एवं समाज द्वारा तिरष्कृत महिलाओं के उत्थान के लिए पर्यतन करना
  • सभी जाति की महिलाओं के लिए शिक्षा, चिकित्सा सुविधाएं एवं सामाजिक सेवा का कार्य करना

देव समाज

1887 ई. में शिव नारायण अग्निहोत्री ने लाहौर में इसकी स्थापना की।

उद्देश्य

  • आत्मा की शुद्धि
  • गुरु की श्रेष्ठता एवं अच्छे मानवीय कार्य करना

राधास्वामी आंदोलन

1861 में तुलसीराम ने जिन्हें शिवदयाल साहू के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने इस आंदोलन की स्थापना की।

आंदोलन के सिद्धांत

  • एक ही ईश्वर की सर्वोच्चता में विश्वास
  • गुरु की सर्वोच्चता में विश्वास
  • सत्संग का आयोजन एवं सादगी पूर्ण सामाजिक जीवन में आस्था

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