असहयोग आन्दोलन-

असहयोग-आंदोलन

कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन मे- असहयोग आन्दोलन 4 सितंबर 1920 को प्रस्ताव पारित हुआ-(वायसराय-लॉर्ड चेम्सफोर्ड-1916-1921)-

गाँधी जी के नेतृत्व मे चलाया जाने वाला यह प्रथम जन आंदोलन था।

1914-1918 के महान युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने राष्ट्रपति पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना जाँच के कारावास की अनुमति दे दी थी।

अब सर सिडनी रॉलेट की शीर्षस्थ एक समिति की संस्तुतियों के आधार पर इन कठोर उपायों को जारी रखा गया।

गाँधी जी ने देशभर में ‘रॉलेट एक्ट’ के खिलाफ़ एक अभियान चलाया।

पंजाब में, विशेष रूप से कड़ा विरोध हुआ, जहाँ के बहुत से लोगों ने युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में सेवा की थी और अब अपनी सेवा के बदले वे ईनाम की अपेक्षा कर रहे थे। लेकिन इसकी जगह उन्हें रॉलेट एक्ट दिया गया।


असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव

कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन(अध्यक्षता- लाला लाजपत राय) में 4 सितंबर 1920 को प्रस्ताव पारित हुआ।

अली बन्धुओं और मोतीलाल नेहरू के समर्थन से यह प्रस्ताव कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया।


आन्दोलन की प्रगति

आन्दोलन शुरू करने से पहले गांधी जी ने कैसर-ए-हिन्द पुरस्कार को लौटा दिया, अन्य सैकड़ों लोगों ने भी गांधी जी के पदचिह्नों पर चलते हुए अपनी पदवियों और उपाधियों को त्याग दिया।

राय बहादुर की उपाधि से सम्मानित जमनालाल बजाज ने भी यह उपाधि वापस कर दी। असहयोग आन्दोलन गांधी जी ने 5 सितंबर 1920  को आरम्भ किया।

पश्चिमी भारत, बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आन्दोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली।

विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए अनेक शिक्षण संस्थाएँ जैसे काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ, बनारस विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि स्थापित की गईं।


शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार-

1)असहयोग आन्दोलन के दौरान शिक्षा संस्थाओं का सर्वाधिक बहिष्कार बंगाल में हुआ।

सुभाषचंद्र बोस ‘नेशनल कॉलेज कलकत्ता’ के प्रधानाचार्य बने।

2) पंजाब में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में बहिष्कार किया गया।

3) शिक्षा का बहिष्कार मद्रास में बिल्कुल असफल रहा।

3) वकालत का बहिष्कार करने वाले वकीलों में प्रमुख थे-

a. चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू(U.P), 

b.विट्ठबाई पटेल और वल्लभ भाई पटेल(GJ),

c. बिहार के राजेन्द्र प्रसाद(BH),

d.मद्रास के चक्रवर्ती राजगोपलाचारी और आसफ अली(DL) आदि।

4) मुस्लिम नेताओं में असहयोग में सर्वाधिक योगदान देने वाले नेता थे-

  • डॉ. अनसारी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, शौक़त अली, मुहम्मद अली आदि।

गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आन्दोलन के ख़र्च की पूर्ति के लिए 1920 ई. में तिलक स्वराज्य फण्ड की स्थापना की गई

 जिसमें लोगों द्वारा एक करोड़ से अधिक रुपये जमा किए गए।


आंदोलन की तैयारी-

गाँधी जी ने यह आशा की थी कि असहयोग को खिलाफ़त के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख समुदाय- हिन्दू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे।

इन आंदोलनों ने निश्चय ही एक लोकप्रिय कार्यवाही के बहाव को उन्मुक्त कर दिया था

और ये चीजें औपनिवेशिक भारत में बिलकुल परिष्कृत थे।

छात्रों ने सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों और कॉलेजों में छुट्टी छोड़ दी। वकीलों ने अदालत में जाने से मना कर दिया।

कई कस्बों और नगरों में श्रमिक-वर्ग हड़ताल पर चले गए।

सरकारी अंतर चार्ट के मुताबिक 1921 में 396 हड़तालें हुईं जिनमें 6 लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख का नुकसान हुआ था।

ग्रामीण क्षेत्र भी असन्तोष से मुक्तित हो रहा था। पहाड़ी जनजातियों ने जंगली कानूनों की अवहेलना कर दी।

कुमाउँ के किसानों ने औपनिवेशिक अधिकारियों का सामान ढोने से मना कर दिया।

इन विरोधी आंदोलनों को कभी-कभी स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवज्ञा करते हुए कार्यान्वयित किया गया।

किसानों, श्रमिकों और अन्य ने अपनी अपनी तरीके से व्याख्या की और औपनिवेशिक शासन के साथ योग असहयोगी ’के लिए उन्होंने ऊपर से प्राप्त निर्देशों पर टिके रहने के बजाय अपने दायित्वों से मेल खाने के तरीकों का इस्तेमाल किया।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति के बाद पहली बार असहयोग आंदोलन के अंग्रेजी राज की नींव हिल गई।   


 प्रिन्स ऑफ़ वेल्स का बहिष्कार-

अप्रैल, 1921 में प्रिन्स ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन पर उनका सर्वत्र काला झण्डा दिखाने का स्वागत किया गया।

गांधी जी ने अली बन्धुओं की रिहाई न किए जाने के कारण प्रिन्स ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन का बहिष्कार किया।

17 नवंबर, 1921 को जब प्रिन्स ऑफ़ वेल्स का बम्बई, वर्तमान मुम्बई आगमन हुआ, तो उनका स्वागत राष्ट्रव्यापी हड़ताल से हुआ।

इसी तरह दिसंबर, 1921 में अहमदाबाद में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यहाँ पर असहयोग आन्दोलन को तेज़ करने और सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने की योजना बनी रही।


चौरी-चौरा काण्ड- वाइसराय लार्ड रीडिंग (1921-26  )-

फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी।

इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई।

हिंसा की इस कार्यवाही से गाँधी जी को यह आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा।

गाँधी जी को मार्च 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ़तार कर लिया गया। गाँधी जी को 6 साल के लिए जेल की सजा सुनाई गई थी।


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