Tirtahan Parvati Sangla Valley

Tirtahan Parvati Sangla Valley

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सांगला या बासपा घाटी|Sangla or Baspa Valley

सांगला या बासपा घाटी हिमाचल प्रदेश की अति सुंदर और मनोरम घाटियों की श्रृंखला है जो किन्नौर जिले में स्थित है।

यह घाटी बसपा नदी के उद्गम स्थल से शुरू होती है।

95 कि.मी. बाद सतलुज नदी में बसपा नदी के मिलने के साथ ही खत्म हो जाती है।

कामरु’ और ‘सांगला’ गांव जो बसपा नदी के दाएं तरफ बसे हैं अधिक जनसंख्या के घनत्व वाले क्षेत्र हैं।

इस घाटी का सबसे ऊंचाई पर स्थित गांव चितकुल है जो भारत का सबसे अंतिम गांव है।

Tirtahan Parvati Sangla Valley
India’s last village, chitkul village

सुप्रसिद्ध ‘चुग शाकगो’ दर्रा इसी घाटी में स्थित है।

इस घाटी पर मानसून वर्षा का भी व्यापक प्रभाव रहता है जिसके परिणामस्वरूप कृषि, बागवानी तथा अन्य उपजाऊ फसलों के लिए यह घाटी अति उपयोगी है।

आधुनिकरण के परिणाम स्वरूप इस घाटी में वेमौसमी सब्जी उत्पादन को प्राथमिकता मिल रही है।


Tirtahan Parvati Sangla Valley


कुल्लू घाटी|Kullu Valley

कुल्लू घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता व् मनोरम पहाड़ियों के लिए प्रसिद्ध है।

यह घाटी 75 km लंबी और 2 से 4 km चौड़ी है।

घाटी की पानी की आवश्यकता व्यास नदी पर निर्भर करती है इस घाटी में गर्म पानी के अनेक चश्मे है।

घाटी में वर्ष में प्राय: दो फसलें उगाई जाती है।

सर्दियों में गेहूं और गर्मियों में मक्की, चौलाई, आलू तथा दालें बोई जाती हैं।

कुल्लू घाटी फलो फलोत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध है, फलों में खुरमानी, सेव, पलम, नाशपाती, बादाम तथा अखरोट उगाए जाते हैं।

वनफशा तथा खुम्ब भी काफी मात्रा में मिलती है, लग घाटी में ऊघण, जुहर, खुड, तिरी तोडू आंली, सुआण (पत्थर के सोपान) पारंपारिक घर आज भी विद्यमान है।


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सतलुज घाटी|Satluj Valley

सतलुज नदी तिब्बत से भारतीय भूमि मे ‘शिपकीला’ नामक स्थान पर प्रवेश करते हुए यह घाटी शुरू हो जाती है।

और बिलासपुर तक फैली हुई है।

यह घाटी जांस्कर, बृहद हिमालय, पीर पंजाल, धौलाधार पर्वत श्रंखला को काटकर पंजाब के मैदानों तक पहुंचती है।

बिलासपुर, रामपुर, भाबा नगर, आदि प्रमुख नगर  सतलुज  नदी के किनारे बसे हुए इस घाटी के प्रमुख स्थल हैं।

सतलुज घाटी आर्थिकी में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है, जहां कई जलविद्युत परियोजनाएं लगाई जा रही हैं।

सतलुज के दोनों ओर का क्षेत्र कृषि प्रधान है यहां गाय, भैंस, भेड़, बकरी सभी प्रकार के पशु पाले जाते हैं।

चीता भालू जैसे हिंसक जीव भी यहां के जंगलों में रहते हैं, तथा कक्कड़, बारहसिंघा जैसे हिरण से मिलते जुलते प्राणी भी यहां रहते हैं।

शुतुद्र के साथ लगने वाले ऊंचे पहाड़ों पर चीड़, देवदार, रई कैल आदि वृक्ष भी कम नहीं,

और इसी के किनारे पर तून, चुई, खैर, पलाश, एरण्ड और किंशुक (ढाक) शुहर के पेड़ भी है।

दुग्धमय में पशुओं के चारे से संबंधित वृक्ष तथा जंगली फलों के साथ-साथ विदेशी जातियों के फल जैसे सेव, नाशपाती भी घाटी में उपलब्ध हैं।

‘दियोली‘ नामक स्थान पर एशिया का सबसे बड़ा ट्राउट मछली पालन प्रजनन फार्म, गोविंद सागर झील, और प्रसिद्ध नलवाड़ी मेला भी इसी घाटी में लगता है।

तिऊन खेपरी जठानी आदि गांव भी है।

जहां गांव की सीमा के अंदर जूते, चमड़े की पेटियां (Belt), तंबाकू, सिगरेट आदि नहीं ला सकते हैं।

कुल्लू में रूपी बादी ‘रूपा’ अर्थात चांदी की खानों के लिए प्रसिद्ध है, पहली बार जे. कैल्बर्ट ने 1871 में चांदी की खानों का निरीक्षण किया था।

रूपी वादी की तीन घाटीयों में से पार्वती-घाटी आदिकाल में मणिकरण, खीरगंगा रुद्रनाग और मानतलाई जैसे तीर्थ स्थानों के कारण बहुत प्रसिद्ध रही है।

गडसा नाला और व्यास नदी के संगम पर ‘मकड़सा’ ( या मकराहड़) काफी लंबे समय तक कुल्लू की राजधानी रह चुकी है।

सैंज घाटी पुरातात्विक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है।

शैंशर के निकट धारा देहुरा में मनु-महाराज का पांच छतों बाला पेगोडा शैली का मंदिर है।

इस घाटी के प्रमुख शहर है मंडी, कुल्लू, भुंतर, शामशी तथा मनाली।

नग्गर किला, नेहरू कुंड, रोरिक कला संग्रहालय, हिडिम्बा मंदिर इस घाटी के मुख्य आकर्षण है।


क्यारदा दून या पौंटा घाटी|Kyrada Doon or Paonta Valley

क्यारदा दून घाटी हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी-पूर्वी भाग में स्थित है।

इसे ‘पौंटा घाटी’ के नाम से भी जाना जाता है यमुना नदी इसे देहरादून से अलग करती है।

इस घाटी में पोंटा साहिब नगर है जहां सिखों का प्रसिद्ध गुरुद्वारा व राम मंदिर है।

यह घाटी उत्तर में नाहन के पर्बत पृष्ठ से लेकर दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों तक फैली हुई है वाटा नदी इसको सींचती है।

इस घाटी में पोंटा साहिब नगर है जहां सिखों का प्रसिद्ध गुरुद्वारा व राम मंदिर है।

मैदानी इलाकों में नीलीखेड़ा तथा इसके नजदीक के क्षेत्र जिनमें निचली डारथी जो कि वाटा नदी के ऊपर में स्थित है।

जामुनखड़ा का पूर्वी भाग टिल्ला गरीबनाथ का पश्चिमी भाग तथा राजवन का दक्षिणी क्षेत्र शामिल है।

क्यारदा दून घाटी का, पारदून क्षेत्र जो की माजरा गांव के समीप स्थित है यह अपने आप में प्राकृतिक किला है।

वास्तविक दून घाटी, यमुना तथा निचली डारथी पहाड़ियों के मध्य स्थित है जिसे गिरी तथा वाटा नदियां सिंचित करती हैं।

राजा शमशेर प्रकाश के शासनकाल में यहां लोगों ने बसना शुरू किया।

घाटी की मुख्य फसलें हैं मक्का, गेहूं, अदरक, जौ तथा गन्ना।

क्यारदा घाटी की साथी घटियां जिला सोलन की सपरों घाटी व दून घाटी है, जिनकी मिट्टी उपजाऊ है।

20वीं शताब्दी के अंतिम दशक से यहां बड़े पैमाने पर नकदी फसलों का उत्पादन किया जा रहा है।


सरसा घाटी 

यह घाटी कालका से लेकर नालागढ़ तक फैली हुई है।

परवाणु, बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़, आदि प्रमुख औद्योगिक शहर है इसलिए इस घाटी को औद्योगिक घाटी भी कहा जाता है।

इस घाटी की शुरुआत डगशाई से होती है जो कुम्हारहट्टी के समीप एक पहाड़ी के उतुंग शिखर पर स्थित है।

कालका के ऊपर शिवालिक पहाड़ियों से निकलने वाली बल्द नदी की आगे जाकर सरसा नदी बन जाती है।

बल्द नदी में नयानगर के समीप दो खड्डों अम्बोटा खड्ड और बरागु खड्ड के आपस में मिलने के बाद अस्तित्व में आती है।

सरसा घाटी में मिले प्राचीन औज़ार इसके ऐतिहासिक महत्व को उजागर करते हैं।

घाटी के औद्योगिक नगरों में स्थापित उद्योगों में काम करने के अलावा खेती-बाड़ी के साथ पशुओं का व्यापार घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय है।

इस घाटी के प्रमुख शहर डगशाई, कसौली, सनावर, नाहरी, बेजा, हरिपुर तथा रामशहर हैं।

घाटी में स्तिथ कसौली शहर शिवालिक पर्वतमाला का एक सुंदर रमणीय पर्यटक स्थल है।

जिस की सबसे ऊंची चोटी ‘मंकी प्वाइंट’ के रूप में जानी जाती है।

कसौली में 1905 में डॉ. सेंपल द्वारा एक पास्चर खोला गया, इसे अब केंद्रीय अनुसंधान संस्थान के नाम से जाना जाता है।

यहां पागल कुत्ता निरोधक वैक्सीनों का निर्माण व सांप के काटे का इलाज होता है।

यहां लॉरेंस द्वारा स्थापित लॉरेंस स्कूल विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़ रहा है।

हरिपुर सरसा घाटी में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल है हरिपुर में गुरुद्वारा भी है।

जोहड़जी पूर्व महलोग रियासत की राजधानी पट्टा से 5 कि.मी. दूर एक पहाड़ी के उतुंग शिखर पर खुली वादी में निर्मित एक प्राचीन गुरद्वारा है।

रामशहर का किला नालागढ़-शिमला मार्ग पर नालागढ़ से 20 किलोमीटर दूर एक पहाड़ के शिखर पर बना है।


कुनिहार घाटी

कुनिहार घाटी शिमला से पश्चिम की ओर 50 किलोमीटर दूर सोलन जिले में समुद्र तल से लगभग 100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

यह घाटी ‘कुणी खड्ड’ से शुरू होती है और ‘तकुरदिया’ गांव तक जाती है।

हिमाचल के अस्तित्व में आने से पूर्व यह घाटी कुनिहार रियासत का एक अभिन्न अंग थी, जिसका मुख्यालय ‘हाटकोट’ में स्थित था।

इस घाटी की मुख्य फसलें गेहूं, चना, दाल, मक्का तथा गन्ना है।


गम्भर घाटी

यह घाटी सोलन जिला को दो भौगोलिक भागों में बांटती है।

शिमला के समीप टूटू के नीचे ‘घुडशली’ गांव के पास से निकलने वाला एक छोटा सा नाला आगे चलकर जम लोग नाले के साथ ‘क्यारगी’ नामक गांव में मिलकर गम्भर नदी को अस्तित्व में लाता है।

यह नदी हरिपुर, जाड़ला, मनलोग, कलां, भयूखरी होती हुई लगदाघाट से लेकर गम्भर नदी रछोग तक बिलासपुर के साथ सोलन के साथ सीमा बनाती है।

इस घाटी की मुख्य फसलें गेहूं, मक्की, टमाटर, अदरक, फूलगोभी, बंदगोभी पालक आलू आदि हैं।

घाटी के प्रमुख स्थल जुब्बलहट्टी,कुनिहार, स्पाटू, भरोली, कठनी, कुठाड़, बनलगी, जगजीत, महलोग घड़शी, छमकड़ी तथा अर्की।

‘अंबुजा सीमेंट प्लांट’ भी इसी घाटी में स्थित है।

सायर मेले के दौरान अर्की में ‘भैंसों की लड़ाई’ का आयोजन किया जाता है।

इस घाटी का ऐतिहासिक स्थल मलौणा का किला नालागढ़ और बिलासपुर की सीमा पर स्थित है।


सपरूं घाटी

यह घाटी सोलन जिले में स्थित है, यहां टमाटर व् खुमानी अधिक मात्रा में होते हैं।

यह वेमौसमी सब्जियों को उगाने के लिए प्रसिद्ध है।

इस घाटी की मुख्य फसलें हैं- गेहूं, मक्का, चौलाई, कोदा तथा चावल।

राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित होने के कारण यहाँ आर्थिक संपन्नता से दूर-दूर तक अपने पांव पसार लिए हैं।


अश्वनी घाटी

इस नदी घाटी की बाई और ‘क्योंथली’ तथा दायीं ओर ‘बघाटी’ बोली, बोली जाती है।

अश्वनी घाटी का क्षेत्र शिमला में कुफरी से लेकर सोलन के गौड़ा तक फैला हुआ है।

इस घाटी का जन्म अश्विनी नदी के रूप में शिमला के टूटी कंडी के समीप ‘बड़ई‘ गांव से हुआ है।

यह नदी महेश गांव से लेकर अयासा गांव तक सोलन के साथ शिमला जिला की सीमा तय करती है।

तथा ‘गौडा’ में जाकर गिरी नदी में मिल जाती है।

इस घाटी के प्रमुख शहर है- शिमला, चायल, कंडाघाट, सोलन तथा धर्मपुर।

घरों की धार’ का किला अश्विनी घाटी का अंतिम महत्वपूर्ण स्थान है।

‘जटोली’ राजगढ़ रोड पर स्थित एक मनोरम गांव है, जहां एक गगनचुंबी शिवालय स्थित है।

जिसका निर्माण कार्य स्वामी कृष्णानंद ने 1980 में प्रारंभ किया था।

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लाहौल और स्पीति घाटी

स्पीति घाटी की मुख्य नदी स्पीति नदी है जिससे इसका नाम पड़ा यह बृहद हिमालय और जांस्कर पर्वत श्रृंखला के मध्य स्थित है।

इस घाटी की चोटियां 3000 मीटर से 6500 मीटर ऊंची है।

काफी मात्रा में बर्फ पड़ने के कारण लोगों को सर्दियों के महीने घरों के अंदर ही गुजारने पड़ते हैं।

लाहौल की घाटी प्रदेश के उत्तर की तरफ स्थित है जो चंद्रा और भागा नदियों के उद्गम स्थली भी है।

यह दोनों नदियां तांडी नामक स्थान पर मिलकर चिनाब नदी को अस्तित्व में लाती है।

लाहौल और स्पीति घाटी के लोग खुशदिल, प्रसन्नचित्त, दयालु हृदय होने के साथ-साथ अंधविश्वासी भी हैं।

लाहौल घाटी स्पीति घाटी की उपेक्षा अधिक उपजाऊ है।

यहां पर अधिकतर ‘जौ’ और ‘गेहूं’ की फसल होती है स्पीति में बौद्धों के अनेक मठ और बौद्ध विहार है।

यहां पेड़-पौधे और घास बहुत कम है धरती लगभग मरुस्थल है इसलिए इसे ‘शीत मरुस्थल’ भी कहा जाता है।

लोगों का जीवन निर्वाह कृषि पशुपालन और छोटे छोटे व्यापार पर निर्भर है।

यहां कई प्रसिद्ध गोम्पा हैं।

ये गोम्पा शिक्षा और संस्कृति का केंद्र हैं जिनमें से कुछ प्रसिद्ध नाम है डंखर, की, ताबो, ‘लह-लुड़’ कुगरी आदि।

सन 996 ई. में स्थापित ‘ताबो गोम्पा’ आज विश्व भर में प्रसिद्ध है यह हिमालय की अजनता है।


चंद्रभागा घाटी

चंद्रभागा दो नदियों का नाम है चंद्रा तथा भागा जो ‘तांदी’ नामक स्थान पर मिलती है तथा चिनाब नदी का रूप ग्रहण करती है।

चंद्रा घाटी को स्थानीय भाषा में ‘रंगोली’ भी कहते हैं।

घाटी में चंद्र नदी के ‘कोकसर’ स्थल से 72 कि.मी. नीचे होने के उपरांत प्रथम मनुष्य निवास मिलता है।

चंद्रा नदी पांगी घाटी से बहती हुई दक्षिण में ‘तरणपाल धार’ नामक स्थान पर चंबा जिले में प्रवेश करती है।

यह क्षेत्र उत्तर पश्चिम में जम्मू, दक्षिण में लाहौल स्पीति जिला, पश्चिम में पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला तथा उत्तर एवं पूर्व में वृहद हिमालय से घिरा हुआ है।

घाटी के अधिकांश क्षेत्र 18 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, घाटी में मुख्यतः वनस्पति देवदार तथा पाइन के पौधे हैं।

भागा घाटी को स्थानीय भाषा में ‘गारा या पुनान’ भी कहते हैं,भागा नदी का उद्गम दक्षिण पश्चिम में  बारालाचा दर्रे के समीप से हुआ है।

इस भागा घाटी को दरचा से केलांग तक ‘तोड़’ तथा उसके उपरांत ‘गारा’ कहा जाता है।

भागा नदी के दाहिने किनारे पर स्थित ‘केलांग’ सुप्रसिद्ध गांव है जो जिला लाहौल-स्पीति का मुख्यालय भी है।


पिन घाटी

पिन घाटी स्पीति घाटी की सहायक है यह ट्रांस हिमालय क्षेत्र में स्थित है

यह क्षेत्र साल के अधिकतर बाद में बर्फ से ढका रहता है तथा जनसंख्या घनत्व काफी कम है।

इस घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन तथा खेती बड़ी है।

पिन घाटी नेशनल पार्क 675 वर्ग किलोमीटर है जो कि 09 जनवरी 1987 में राष्ट्रीय पार्क बना।

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पांगी घाटी 

घाटी चिनाब नदी के किनारे पर स्थित है जो पीरपंजाल और वृहद हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के पृष्ठों को काटती है।

पांगी घाटी दक्षिणी पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर कश्मीर की पीर पंजाल श्रृंखला से जुड़ी है।

इस घाटी में चिनाब नदी का विस्तार लगभग 80 कि.मी. है ‘साच’ क्षेत्र के पास ही इसमें से ‘सेचु नाला’ गिरता है।

सुराल नाला, संसारी नाला पांगी घाटी के अन्य जल स्त्रोत भी चिनाब नदी में गिरते हैं।

‘सेचु नाला‘ छोटे-छोटे ‘तवान’ और ‘चस्क’ नाले का पानी अपने में मिलाकर सेचु से साच क्षेत्र तक गहरी पर्वतीय घाटी मे बहता है।

पांगी घाटी साल में लगभग 8 माह बाहरी क्षेत्र से कटी रहती थी, इसलिए इसे ‘काले पानी’ की संज्ञा भी दी जाती थी।

पांगी घाटी के अधिकतर निवासी हिंदू तथा कुछ बौद्ध धर्म के अनुयाई भी हैं।

बौद्ध धर्म के अनुयाई मंगोलियन जाति से संबंधित है।

जो मुख्यता: पांगी घाटी के ऊपरी स्थानों में रहते हैं इनका निवास स्थल ‘भटोरी’ है।

पांगी घाटी चरागाहों के लिए मशहूर है यहां की जलवायु शरद और शुष्क है, परंतु यहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है।

पांगी घाटी दयार, कैल, तोष, पहाड़ी पोपलर, विल्लो और ऊंचे स्थान पर भोज पत्र के वृक्ष बहुतायत से उगते हैं।

फलदार वृक्षों में अखरोट, चैस्टनट, ठंगी, चिलगोजा के अलावा जड़ी बूटियों में रत्तनजोत, कुठ, अतिश, पतीश, वंचोक काला जीरा, आदि।

वन पशुओं में पिज़,मही,कर्थ रौँस,काला भालू, इत्यादि वन पक्षियों के अन्य पक्षियों के साथ मोनाल ऊँचे पर्वतों में पाया जाता है।

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रावी घाटी

रावी घाटी या चम्बा घाटी काफी स्वच्छ व सूंदर है, लम्बे समय तक यह घाटी बाहरी संसार के लिए अज्ञात स्थान रही थी।

घाटी के निचले क्षेत्र जिसकी अधिकतम ऊंचाई 1000 मीटर में है शीशमपीपल के वृक्ष पाए जाते हैं।

घाटी के निचले क्षेत्र के खेत चावल उगाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं जबकि ऊपरी हिस्से में मक्का, गेहूं, जौ और दूसरी फसलें उगाई जाती है।

इस घाटी में प्रमुख शहर चंबा बसा हुआ है जो रावी नदी के बाएं तरफ स्थित है,यहां जिले का मुख्यालय भी है।

दूसरे प्रमुख नगर भरमौर, डलहौजी, और खजियार है जो घाटी की शोभा बढ़ा रहे हैं इस घाटी में रहने वाले लोगों को “चंबयाल” कहते हैं।

रवि घाटी में भेड़ बकरी पालन की मुख्य व्यवसाय है कृषि और बागवानी भी की जाती है।

व्यवसायिक तौर पर स्थानीय निवासी मधुमक्खी पालन भी करते हैं।

रवि घाटी के कृषक कुछ पारंपारिक फसलें भी पैदा करते हैं।

जैसे फुल्लण, चिणे, भरेस कोदरा बजभंग और सियूल आदि, चंबा घाटी में भी काफी मात्रा में गुछियां पाई जाती है।


चुराह घाटी

इस घाटी के सभी जल स्त्रोतों का सृजन स्यूल खड्ड करती है, इसलिए इस भू-भाग को चुराह घाटी के नाम दिया गया है।

वर्तमान में चुराह घाटी 2 तहसीलों में बंटी हुई है।

अप्पर चुराह का तहसील मुख्यालय तीसा में और निचली चुराह का तहसील मुख्यालय सलूणी में है।

यह पूरी घाटी तीन ओर से वृत्ताकार हिमाच्छादित जोतों की गोदी में बसी हुई है।

अप्पर चुराह के पूर्व दक्षिण में ‘द्राटी’ और महलबा के जोत है जिन्हें लांघकर लाहौल स्पीति में पहुंचते हैं।

तीसा के पूर्व में काहलों नामक विशालकाय जोत है जो कि चुराह घाटी के सभी जोतों से अधिक ऊंची है।

तीसा के उत्तर में ‘चैहणी’ और ‘अडाऊ’ के जोत हैं जिन्हें लांघकर एक ओर से प्रसिद्ध चामुंडा मंदिर, मिन्धल में और दूसरी ओर से पांगी के फिंडरू नामक स्थान पर पहुँचते है।

अप्पर चुराह की पश्चिमी-दक्षिण में ‘मैहलवार’ की जोतों की श्रृंखला है जिसे पीर-पंजाल भी कहते हैं।

लोअर चुराह के पश्चिम में ‘पधरी’ नामक जोतों की श्रंखला है।

इस जोत के दर्रे को लांघकर भी जम्मू-कश्मीर के जिला डोडा की तहसील भद्रवाह में पहुंचते हैं।

वास्तव में स्यूल नदी का मूल स्त्रोत भी  ‘पधरी’ ही माना जाता है।

चुराह घाटी 35% के लगभग वनों से ढकी हुई है जो कि पूरे हिमाचल प्रदेश में सर्वाधिक है।

इस घाटी के लोग गर्मियों में प्राया वनौषधीय जड़ी-बूटियां उखाडते हैं।

इन जड़ी बूटियों में कड़वी पतीस, धूप ,कौड, भूतकेसी तथा पांजा इत्यादि काफी महंगे दामों में बिकते हैं।

पुरुष ऊनी चोला या ऊनी कोट, सिर पर पगड़ी, चूड़ीदार पायजामा तथा चोले के बाहर ऊनी या सूती शाल पहनते हैं।

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स्वां घाटी या जस्वां-दून घाटी

स्वां घाटी, स्वां नदी तथा इसकी 73 सहायक नदियों के दोनों और जिला ऊना में स्थित है।

इसे जस्वां-दून घाटी के नाम से भी जाना जाता है, इसका क्षेत्रफल उत्तर पश्चिम में दौलतपुर से दक्षिण में पंजाब में फैला हुआ है।

इस घाटी के प्रमुख शहर दौलतपुर, अम्बोटा, गगरेट, मुबारिकपुर, अम्ब पंजाबर खड्ड , घालूवाल, ऊना, हरौली, व संतोषगढ़

स्वां नदी को ‘ऊना का शोक’ के नाम से भी जाना जाता है

इसी कारण केंद्र सरकार ने वर्ष 2013 में इसके तटीयकरण हेतु 700 करोड रुपए की राशि आवंटित की थी


पब्बर घाटी

पब्बर घाटी रोहड़ू तहसील में स्थित है, इसलिए इसे रोहड़ू घाटी भी कहते हैं, चांशल चोटी से पब्बर नदी निकलती है

चंद्रनाहन झील से यह नदी जल धारा के रूप में पहाड़ों के भीतर प्रवाहित होती है

विन्गू नामक पहाड़ के पीछे से होकर माईला गांव में इसी नाम की खड्ड में मिलकर नदी के रूप में प्रकट होती है

पब्बर नदी का चिडगांव नामक स्थान में पहुंचने पर आंध्रा नामक बड़ी खड्ड इसमें मिलती है

बड़ियारा में मोराल डांडा से निकली एक खड्ड मथरेटी इसमें मिलती है तथा यह सीमा, सैंजी, सिमोली के पास से गुजरती हुई रोहड़ू पहुंचती है

रोहड़ू में एक अन्य छोटी सहायक नदी शिकडी इसमें आकर मिलती है

घाटी की पहाड़ियां सतलुज घाटी की अपेक्षा कम ढलान वाली लेकिन कुल्लू घाटी की अपेक्षा अधिक ढलानदार है

यह नदी जुब्बल तहसील का अधिग्रहण करते हुए लगभग 100 मील का लंबा सफर तय कर कर जुब्बल तहसील के अंतिम छोर पर तथा उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित ‘त्यूणी’ स्थान पर यह यमुना की प्रमुख सहायक नदी ‘टोंस’ में मिलती है और ‘टोंस’ कहलाने लगती है

प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर स्थली हाटकोटी से यह घाटी शुरू होती है, और चांशल शिखर के आधार पर ‘टिकरी’ स्थान पर खत्म होती है

घाटी की चोटियां वह घटियां 1500 मीटर से 5000 मीटर ऊंची है

इस घाटी की मुख्य खड्डे हैं- आंध्रा खड्ड, पिंजौर खड्ड, तथा शिकारी खड्ड

पब्बर घाटी को अध्ययन की दृष्टि से पांच प्रमुख भागों में बांटा गया है-

(01) रणसर की नाली:

समतल और उपजाऊ भूमि वाली यह वादी लाल पर्वत चावल के लिए प्रसिद्ध है

मथरेटी खड्ड के किनारे जांगला मे अनुसार नाली की अधिष्ठात्री देवी ‘भीमकाली‘ का प्रसिद्ध मंदिर है

(02) टिकराल की नाली:

चांशल दर्रे के निकट होने के कारण इसका अधिकतर क्षेत्र 4 से 6 महीने बर्फ से ढका रहता है

इस क्षेत्र की पर्वत श्रृंखलाओं लांघ कर दूसरी तरफ बसपा घाटी के सांगला में पहुंचा जा सकता है

चांशल दर्रे की दूसरी तरफ दक्षिण की ओर डोडरा-क़्वार है

छुआरा ब्लॉक पिछड़ा क्षेत्र घोषित है इस वादी का कुछ भाग ‘घोड़ी गिराईक’ के नाम से भी जाना जाता है

दारखुल (डिसवानी गांव) में ‘गुडारु देवता का मंदिर’ तथा मसली गांव में प्रसिद्ध ‘पांडव मंदिर’ इसी क्षेत्र में है

(03) जिगाह की नाली:

क्षेत्रफल की दृष्टि से यह इलाका सबसे बड़ा है यहां आंध्र प्रोजेक्ट का निर्माण हुआ है

ये वादी पंचनागों का क्षेत्र मानी जाती है ये पंचनाग, गोष्कचार, विरिड, थईनाग,खनियारा तथा सुन्नी है

यह सभी नाग देवता स्थानीय बोली में ‘झांगरू देवता’ के नाम से जाने जाते हैं

(04) स्पैल की नाली:

इस वादी का प्रवेश द्वार ‘कांसा कोटि’ है ‘बकरालु’ तथा ‘अकटंगा’ यहां के ग्राम देवता हैं।

यहां प्रत्येक गांव के साथ एक खड्ड है जो एक गांव को दूसरे गांव से अलग करती है।

(05) नावर की नाली:

पब्बर और शिकडी के संगम के दाहिने ओर का इलाका नावर के नाम से प्रसिद्ध है इसकी सीमा पश्चिमी की ओर कोटखाई तथा उत्तर की ओर कोटगढ़ से लगी है

घाटी में असंख्या देवी-देवताओं के मंदिर हैं लेकिन प्रमुख देवता हनोल के ‘महासू’ में है, जिनके लगभग 50 अन्य मंदिर भी है

मसाली गांव का पांडव मंदिर जो कि पब्बर नदी के बाएं किनारे पर स्थित है अपने आप में एक अनूठी कृति है

पब्बर घाटी के प्रमुख स्थल है रोहड़ू, रणसार, जुब्बल तहसील के हाटकोटी, सरस्वती नगर (सावड़ा) आदि

घाटी का भाग वनों से भरा पड़ा है प्रमुख वनों में देवदार, चीड़, रई, बान, कनौर, मोहरू आदि वृक्षों की बहुतयात है

मोहरू के वृक्ष की लकड़ी जलाने तथा पत्तियां भेड़-बकरियों के चारे के लिए उत्तम मानी जाती है

यह घाटी महत्वपूर्ण जड़ी बूटियों का भी स्त्रोत है


बल्ह घाटी

बल्ह घाटी मंडी जिले में स्थित है इसे सुंदरनगर घाटी के नाम से भी जाना जाता है।

इसके उत्तर में शिमला का पृष्ठ और दक्षिण में शिवालिक की मनोरम पहाड़ियां है।

इसमें पानी की जरूरतों को पूरा करने में सुकेती नदी का प्रमुख योगदान है।

इस घाटी की मिट्टी चिकनी, रेतीली, तथा गहरे भूरे रंग की है।

कृषि के लिए मुख्य फसलें-गेहूं, मक्का, गन्ना ,अदरक तथा धान है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए पशुपालन सब्जी उत्पादन मुर्गी पालन तथा फल उत्पादन को भारत जर्मन कृषि परियोजना 1962 के अंतर्गत विशेष महत्व दिया जा रहा है।


इमला-विमला घाटी

यह घाटी मंडी जनपद मुख्यालय के दक्षिण पूर्व में शिकारी धार से परलोग तथा व्याप्त घाटी की अपनी अलग ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत रही है।

इमला-विमला दो प्रमुख जल धाराएं हैं जो परलोग के समीप सतलुज नदी में विलीन हो जाती हैं।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र को ‘सुकेत’ के नाम से जाना जाता था।

इस क्षेत्र की बस्तियाँ वैदिक काल से पूर्व बस चुकी थी

जिसका प्रमाण यहां पाई जाने वाली प्राचीन मानव जातियों कोली, कनैत,नाग, यक्ष, किन्नर, दास, बेड्डे आदि है।

इमला-विमला नदियों के तट पर जन-जीवन कृत (सत्य) युग से विद्यमान है कृति युग के ऋषि भृगु का ममेल से संबंध रहा है।

इमला की जलधारा का उद्गम डी .पी.एफ. दोफा जंगल के महूढोंग से होता है, जबकि विमला का उद्गम ‘गुड़ाह‘ से होता है।

विमला नदी के दाएं किनारे ‘सनरली’ नामक स्थान सोना धातु निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा है।

यहां मुख्य फसलें गेहूं, धान, जौ, सरसों, माश तथा आलू, गोभी, मूली, लहसुन, प्याज, मेथी आदि शाक सब्जियां  हैं।

किसी समय के यहां गेहूं के दाने का भार 50 ग्राम तक होता था, जिसका प्रमाण एक दाना गेहूं ममलेश्वर मंदिर में आज भी चांदी की डिबिया में सुरक्षित रखा गया है।

इस क्षेत्र में प्रातः के भोजन को ‘नुहारी’, मध्य को ‘कलारी’ अपराहन को दुपहरी, तथा रात्रि भोज को ब्याली (वैली )कहा जाता है।


 

कांगड़ा घाटी

कांगड़ा घाटी में सुनहरी सफेद चादर ओढ़े धौलाधार पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में शिवालिक की पहाड़ियां है।

यह हिमालय की दर्शनीय घाटियों में से एक है कांगड़ा घाटी हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रही है।

इसकी श्रृंखलाएं पश्चिम से पूर्व की ओर लगातार उठाव लिए हुए हैं जो शाहपुर से बैजनाथ और पालमपुर की ओर विकसित है।

कांगड़ा घाटी का इतिहास भारत के इतिहास में विशेष स्थान रखता है, यहां की चित्रकला तो विश्व प्रसिद्ध है।

बैजनाथ पालमपुर कांगड़ा धर्मशाला और नूरपुर किस घाटी के प्रसिद्ध शहर हैं।

शोभा सिंह कला केंद्र (अंद्रेटा ), शिव मंदिर बैजनाथ, निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय मैकलोड़गंज, चामुंडा मंदिर, ब्रजेश्वरी मंदिर कांगड़ा, तपोवन संदीपनी हिमालया पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण के केंद्र हैं।

Tirtahan Parvati Sangla Valley


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